Friday, June 22, 2012

सिनेमा संभलकर बनाईये, दर्शक होशियार हो गया है ।


'वो जमाना गया जब हीरो मरता मरता अपने भगवान से एक बार जीवनदान देने की मांग करता है और भगवान हीरो की सुन लेता है हीरो दोबारा उठता है और दुश्मनों को खत्म करके अपनी मां बहन इत्यदि को बचा लेता है, दर्शक तालि बजाते हैं और घर आ जाते है.
अब हीरो लड़ता लड़ता मर जाता है लेकिन भगवान को बीच में नही लाता, मसलन अपनी लड़ाई खुद लड़ता है, अब या तो हीरो का भगवान से भरोसा उठ चुका है या बॉलिवु़ड का या फिर हिंदुस्तान का दर्शक समझदार हो गया, आप कुछ भी दिखाओगे वो ताली बजाएगा ऐसी उम्मीद करना बेमानी है' ।

मतलब साफ है लोगों की सोच बदली है और यही कारण है कि सिनेमा बनाने वालों को भी अपनी सोच में बदलाव करना पड़ा । 
आजकल अधिकतर जो फिल्में बन रही है वो नई कहानियों पर बन रही है निर्माता-निर्देशक नए नए प्रयोग कर रहें है । फिल्मों के फिल्मांकन का तरिका भी काफि हद तक बदल चुका है अब ना तो भारी भरकम कैमरा होता है और ना ही लंबी चौड़ी फिल्म युनिट, गिनती के लोग मिलकर एैसा सिनेमा बना देते है जो अंतर्राष्ट्रीय लेवल पर अपनी पहचान बनाता है । फिल्मकार फिल्म बनाते वक्त सामाजिक मुद्दो को भी साथ लेकर चल रहे है जो कि सिनेमा के लिए अच्छी बात है,

लेकिन कई बार इंसान जब नए प्रयोग करता है तो असफल भी हो जाता है फिल्म पिपली लाईव ने प्रयोग किया और हिट हुई । लेकिन जब हम शांधाई देखते हैं तो वो फिल्म कम ओर फसाद ज्यादा लगती है । दर्शक मनोरंजन के लिए फिल्म देखने जाता है ना कि अपने दिमाग का दिवालिया करने के लिए, शांघाई ने लोगो को सोचने पर मजबूर कर दिया  कि कोई कैसे ऐसी भटकाऊ फिल्म भी बना सकता है जिसकी ना कहानी का अता-पता हो और ना ही कलाईमैक्स का, जिसमें ना डाईलोग समझ आ रहे हो ।

फिल्म बनाना आसान काम नहीं है लेकिन कई बार सामाजिक मुद्दो पर फिल्म बनाते वक्त निर्माता-निर्देशक पटरी से उतर जाते है और फिल्म का अंत होने से पहले ही लोग समझ जाते हैं कि उन्होने पैसे खराब कर लिए हैं । सामाजिक मुद्दो पर फिल्म बनाने से पहले जब तक रिसर्च ठीक से ना कि जाए तब तक फिल्म पूरी नहीं होती ।
फिल्म बनाना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है । दिन रात महनत करके और ढ़ेर सारी परेशानियों का सामना करने के बाद एक फिल्म पूरी होती है । फिल्म बन तो जाति है लेकिन अब फिल्म को सिनेमा हॉल तक पहुंचाना कोई आसान काम नहीं है वो भी अगर फिल्म कम  बजट वाली  है तो काफि मुश्किल होता है हॉल तक पहुंचना । आपकी सारी महनत तो दर्शक ही एक दिन में सफलता दिला सकते हैं और खारिज भी कर सकते है । दर्शक इज किंग .

Friday, April 6, 2012

टीवी का बनाया हुआ ‘नायक’ निर्मल बाबा


निर्मल बाबा का प्रचार प्रसार खुब हो रहा है, घर घर में निर्मल बाबा के उपायों की चर्चा है निर्मल बाबा की चर्चा है काफि लोग हंसते है काफि लोग आंख बंद करके कोटि कोटि प्रणाम कर रहे है । लोग बड़ी सिद्दत से सेवा भाव से 2-3 हजार खर्च करके सामागम में जा रहे हैं ।

कई लोग 2012 के अंत तक निर्मल बाबा की दुकान बंद होने की भी बात कर रहे हैं ।

आखिर है कौन ये बाबा जो इतनी जल्दी हमारे और आपको घरों में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रहा है ।

क्या है इसके पास एैसा जो लोग इसके बताए गए उपायों से ठीक हो जा रहें है लोगो पर कृपा बरस रही है ।

क्या ये कोई भगवान है या भगवान के रुप में कोई फरिस्ता । या ये सिर्फ टीवी द्वारा बनाया गया वो नायक है जो लोगो के दिलों में अपनी जगह बना चुका है ।

लोगों के बीच निर्मल बाबा को नायक बनाने में टीवी की भूमिका कितनी है और हमारे अंधविश्वासी समाज की कितनी ।

दरअसल बाबा की सच्चाई से पर्दा उठना तो अभी बाकि है लेकिन ये जो कोई भी है टेलिविजन ने इसे भगवान बना दिया है । वही टेलिविजन जो मुंबई हमले के वक्त हमारी तैयारियों की जानकारी पाकिस्तान पहुंचाता रहा वहीं टेलिविजन जिसने पड़ोसी मुल्कों को चिल्ला चिल्ला कर ये बता दिया कि हमारे पास लड़ने के लिए प्रयाप्त हथियार और गोले नहीं है आप चाहें तो हमला कर सकते हैं ।

टीवी कि भुमिका पर अकसर सवाल उठता आया है खासकर उस टीवी कि भुमिका पर जो समाज के असल मुद्दों को सामने लाता है बात खबरियां चैनलों की हो रही है ।

लोगों ने जब जब मुझसे ये कहा कि टीवी बाजारवाद के काले साए में घिर चुका है तो मैने हमेशा से उनकी बात का विरोध किया और हमेशा से ही उन्हे ये समझाने की कोशिश की कि एक चैनल को चलाने में बहुत खर्चा होता है ।

मैं आज भी अपनी बात पर कायम हूं कि चैनल को चलाने में बहुत पैसा खर्च होता है लेकिन उस पैसे को निकालने के लिए हमारे पास विज्ञापन होते है लेकिन जब हम विज्ञापन की रेस से बाहर निकलकर इस तरह के बाबाओं को अपने चैनल की शान समझने लगते है तो वाकई दुख होता है ।

हम ये कर क्या रहे हैं आखिर हम करना क्या चाहते है किस तहर की जिम्मेदारियां हम निभा रहे हैं हम कौन सा समाज तैयार कर रहे है हम अपनी आने वाली जेनरेशन को देना क्या चाहते है । निर्मल बाबा ।

 भुखमरी से परेशान देश के लोगो को सैंडविच खाने की सलाह देने वाले ढोंगी बाबा की काली कमाई का हिस्सा हम हज्म कर पाएंगे य़ा नहीं ।

दरअसल हमारे देश में टेलिविजन माध्यम की ताकत इतनी  बढ़ चुकी है कि चंद मिनटों में किसी को भी हिरो या भगवान बनाया जा सकता है

लेकिन दुर्भाग्य ये है कि चंद पैसे को लिए हम निर्मल बाबा जैसे ढोंगियों की जमीन तैयार कर रहे हैं । टीवी एक एैसा माध्यम है जो किसी को भी हीरो बना सकता है बसर्ते आप उसकी कीमत चुका सकें ।

लेकिन सवाल ये है कि अगर टीवी इतना प्रभावसाली हो चुका है तो इसका फायदा अंधविश्वास को बढाने में होना चाहिए या समाज हित में.

क्या हम अपनी ही आने वाली जेनरेशन के लिए एक अंधविश्वासी कुआं तैयार कर रहे हैं जो एैसे बाबा लोगो के चंगुल में आकर इसी कुएं में डूबने वाली है ?

Tuesday, January 10, 2012

और तेरी आवाज यूँही दबा दी गयी

तेरी आवाज 
यूहीं दबा दी गयी
तू  कुछ कर ना सका
इसलिए किसी ने तेरे लिए कुछ ना किया
कल कोई 'अपने' लिए तरसेगा
क्योंकि 'अपने' लिए भी कोई कुछ ना करेगा
जो कर सकते थे 
वो लोग मजबूर हो गए
या बेसर्मी का लिबास ओढ़ लिया
एक दिन तमाशा हर तरफ होगा 
आग हर जगह लगेगी 
पर पानी गेरने वाला कोई नही मिलेगा 
तेरे जीवन से तांडव नुमा खेल कर दिया 
कुछ तो बात थी
जो तुझपे बेवजह का सितम ढा दिया
तुने खुद अपनी आवाज ना उठाई , 
आज हमें अपनी बेसरमी पे अफ़सोस होता है 
की हम भी कुछ कर न सके,
और तेरी आवाज यूँही दबा दी गयी 
पर कब तक, एक दिन तो आएगा , तेरी भी तूती बोलेगी , बेसर्मो के मुंह से लिबास उठेगा और हर तरफ तेरी ही आवाज गूंजेगी..


( एक मित्र को समर्पित ये कुछ लाईने, जिसके लिए मैं कुछ कर ना सका और आज अफ़सोस होता है की मैं कुछ करने लायक ही नही था  ) 

Saturday, January 7, 2012

अभिव्यक्ति की आज़ादी है या कांग्रेस का डमरू ?



अब तो अन्ना जी ने भी कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करने से मना कर दिया है, कांग्रेस जो चाह रही थी वही तो हो रहा है देश में, अभिव्यक्ति की आज़ादी को तो  कांग्रेस ने अपना  डमरू समझ लिया है जब चाहे बजाओ, लेकिन ऐसा कब तक चलेगा,आखिर कब तक खोकले लोकतंत्र के सहारे जीते रहेंगे ओर जिंदा रहेंगे...क्या इसका कोई विकल्प है 
सोशल नेटवर्किंग पर बैन की बात के बाद अब उसका असर होता दिख रहा है ,कानपुर के युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की वेबसाइट 'कार्टून अगेंस्ट करप्शन डॉट कॉम’ पर प्रतिबन्ध लगा दिया है,
आखिर ये लोग हमारे बोलने , लिखने की आज़ादी के पीछे क्यों पड़े हुए है, - तस्वीर देखें -  

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मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक स्थानीय वकील की शिकायत पर कानपुर के युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की वेबसाइट 'कार्टून अगेंस्ट करप्शन डॉट कॉम’ पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।असीम पर आरोप है कि उन्होंने अपने कार्टूनों के जरिए देश की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। मैंने असीम त्रिवेदी के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम वाले कार्टून देखें हैं,वे भ्रष्टाचार पर तीखी और सीधी चोट करते है। उनमे किसी का मजाक नही बल्कि आम आदमी की भावनाओं की,गुस्से की वास्तविक अभिव्यक्ति है। मेरी निगाह में यह सिर्फ कार्टूनिस्ट पर प्रतिबन्ध लगाना नहीं बल्कि मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सुनियोजित तरीके से नियन्त्रण की शुरुआत है। 
आखिर कोई किस आधार पर किसी वेबसाइट,लेख,नाटक,पैन्टिग या किताब पर प्रतिबन्ध लगा सकता है? सच कहना क्या कोई अपराध है? हमारे नेता या सरकार इतनी कमजोर या डरपोक क्यो है? वे असलियत से क्यो डरते है? हमारे बोलने की,लिखने की,कहने की आजादी पर रोक क्यो लगाना चाहते है ? ये केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल नही है, ये केवल लोकतान्त्रिक हको का हनन भर भी नही है, बल्कि ये एक चुनोती है, असल मे ये हमारे संवैधानिक अधिकारो पर सीधा हमला है। 
असीम का आरोप है कि वेबसाइट को बैन करने की भी मुंबई पुलिस ने कोई जानकारी उन्हे नहीं दी।वेबसाइट की प्रोवाइडर कंपनी बिगरॉक्स.कॉम ने एक मेल द्वारा असीम को साइट बंद करने की सूचना दी। जब बिगरॉक्स कंपनी से बात हुई तो उन्होने असीम को मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच से संपर्क करने को कहा। क्राइम ब्रांच मे कोई बताने वाला नही कि वेबसाइट को बैन क्यो किया गया? या साइबर एक्ट की किन धाराओं में केस दर्ज किया गया है? अब पता चला है कि महाराष्ट्र के बीड़ जिला अदालत ने स्थानीय पुलिस को असीम पर राष्ट्रद्रोह का केस दर्ज करने का आदेश भी दे दिया है। ये और भी शर्मनाक हरकत है। 
आरोप है कि उनके कार्टूनो मे संविधान और संसद का मजाक उडाया गया है। पर सवाल ये भी है कि जब सांसद संसद में हन्गामा करते है,खुलेआम नोट लहराते है,लोकपाल बिल फाडते हैं,चुटकुलेबाजी करते है तब क्या वे संसद का मजाक नही उडाते? देश की जनता का अपमान नहीं करते? 
मैं असीम त्रिवेदी को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि वह अकेले नहीं हैं। सरकार की इस गैरलोकतांत्रिक कारवाई के खिलाफ,हम सब उनके साथ खड़े है ।

Thursday, December 29, 2011

सपने के पीछे बेसुध होकर भागता 'मैं'


जिंदगी के वो पल जो हमने हंसी मजाक में गुजार दिए शायद अब कहीं याद आते है ओर सोचता हूँ की हमने बहुत अच्छा किया की वो पल मजे में जी लिए क्योकि आज का जीना भी कोई जीना है.
हर पल कुछ हासिल करने की लालसा ने दिल ओर दिमाग को दिवालिया कर दिया है, 

ख़ुशी, गम और त्यौहार तो जैसे नाराज होकर कोसो दूर कहीं चले गए हैं ओर पीछे छोड़ गए एक इठलाता ओर झुंझलाता हुआ सपना.

ये सपना आगे भागता जा रहा है हम बेसुध होकर पीछे दौड़ लगा रहे है , शायद इसीलिए जन्म लिया था इसीलिए स्कूल से लेकर कालिज की किताबो का कल्याण किया था, अब सोचता हूँ  अगर हम न होते तो वो किताबे कौन खरीदता, हम न होते तो स्कुल वालो को मोटी फीस कहाँ से मिलती, हम न होते तो किताबो के लेखको का घर कहाँ से चलता, वो पेन पेंसिल बनाने वालो को रोटी कहाँ से मिलती.
दरसल वो एक खेल था और हम उसके मोहरे थे लोग मिलते गए हमसे खेलते गए और वो हमारे बलबूते अपना घर बसाते गए आज वो महलो में रहते है और हम............

शायद ज्ञान की धारा में हम ठीक से बह नही पाए
गहरा समंदर था हम पैर जमा नही पाए !!

अब हालत एक सन्यासी जैसी हो गयी है जिसके पास बहुत कुछ था 'हंसी ख़ुशी गम' लेकिन उसने सबकुछ खो दिया अब न कुछ पाने की तमन्ना है ओर न कुछ खोने के लिए बचा है....

जिंदगी के वो पल जो हमने हंसी मजाक में गुजार दिए अब बहुत याद आते है....जारी है 

Monday, January 17, 2011

कुछ भी टर्न नही कर सकी फिल्म टर्निंग 30



मुख्य कलाकार : गुल पनाग, पूरब कोहली, सिद्धार्थ मक्कड़, अनीता कंवर, राहुल सिंह, समीर मल्होत्रा, इरा दूबे
निर्देशक : अलंकृता श्रीवास्तव
तकनीकी टीम : निर्माता- प्रकाश झा, संगीत- सिद्धार्थ, सुहास
टर्रि्नग 30 जीवन के तीसवें बसंत में प्रवेश कर रही अपरिपक्व और भावुक नैना सिंह के परिपक्व और व्यावहारिक बनने की कहानी है। तीस की उम्र की दहलीज पर खड़ी नैना अचानक खुद को अकेला पाती है। एक तरफ तीन वर्ष पुराना उसका प्रेम संबंध टूट चुका है, तो दूसरी तरफ ऑफिस पॉलिटिक्स के कारण उसकी नौकरी खतरे में है। साथ में तीस की उम्र की मजबूरी और ढलते यौवन का तनाव..। उम्र के इस पड़ाव पर निजी और प्रोफेशनल जीवन के अस्थायित्व से नैना परेशान है। कॉलेज के पुराने मित्र की नजदीकियां भी नैना को खुशियां नहीं दे पाती। आखिरकार,नैना निर्णय लेती है कि वह अपनी खुशियां खुद वापस लाएगी। आत्मबल से नैना बिखरी खुशियों को समेट लेती है। अब वह परिपक्व और समझदार हो चुकी है।
टर्रि्नग 30 हिंदी फिल्मों के दर्शकों को निराश करेगी। फिल्म के 70 प्रतिशत संवाद अंग्रेजी में है। हिंदी के संवाद कभी-कभी सुनने को मिल जाते हैं। टर्रि्नग 30 का परिवेश और ट्रीटमेंट महानगरों के उच्च वर्ग की जीवनशैली को दर्शाता है जिससे आम भारतीयों का रिलेट कर पाना मुश्किल है।
बोल्ड और बिंदास शैली की महिला प्रधान फिल्म है टर्रि्नग 30। हॉलीवुड में ऐसी फिल्मों को चिक फ्लिक कहा जाता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में ऐसी फिल्मों का निर्माण रोचक है। निर्देशिका अलंकृता श्रीवास्तव ने टर्रि्नग 30 के जरिए यह प्रयास तो किया है, पर अनावश्यक दृश्यों को तरजीह देने के कारण फिल्म का मूल कथ्य हाशिए पर चला गया। जिस कारण टर्रि्नग 30 अपने उद्देश्य से दर्शकों को बांध नहीं पाती। गुल पनाग का अभिनय उल्लेखनीय है। गुल ने नैना सिंह की जटिल भूमिका को सहजता से निभाकर एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे सक्षम अभिनेत्री हैं।
रेटिंग- 2 स्टार

दर्सक हो गये यमला पगला दीवाना

बड़े  अरसे  बाद  देओल्स  फॅमिली  दोबारा  बड़े  परदे  पर  एक  साथ  दिखाई  दी दर्सको को फिल्म  का बेसब्री  से इंतजार था  खासकर के देओल्स फेमिली  के फेंस को २००७ में  तीनो देओल्स एक साथ आये थे फिल्म "अपने" में ओर वो एक हिट फिल्म साबित हुई थी !


 फिल्म यमला पगला दीवाना दर्सको को खूब पसंद आ रही है फिल्म अब तक तक़रीबन १०० करोड़ का बिजनिस कर चुकी है !!



मुख्य कलाकार : धर्मेन्द्र, सन्नी देओल, बॉबी देओल, कुलराज रंधावा, नफीसा अली, अनुपम खेर, जॉनी लीवर, पुनीत इस्सर, मुकुल देव आदि
निर्देशक : समीर कार्णिक
तकनीकी टीम : निर्माता- समीर कार्णिक, नितिन मनमोहन, गीत- आनंद बख्शी, अनु मलिक, राहुल सेठ

यमला पगला दीवाना हिंदी प्रदेश के फिल्म प्रेमियों के साथ-साथ अप्रवासी भारतीयों को ध्यान में रखकर बनाई गई साफ-सुथरी पारिवारिक मनोरंजक फिल्म है। उल-जुलूल, फूहड़ और अर्थहीन संवादों के जरिए हास्य उत्पन्न करने की बजाए यमला पगला दीवाना सहज रोमांचक परिस्थितियों और रोचक संवादों से हंसाती है। लेखक-निर्देशक ने इस बात को फिल्म के आरंभ में ईमानदारी से स्वीकार किया है कि एक परिवार के बिछड़ने और मिलने की कहानी बहुत पुरानी है। 

मां, बीवी और बच्चों के साथ परमवीर कनाडा में रहता है। एक मेहमान जब उनके घर में टंगी एक तस्वीर को देखकर चीखने लगता है कि उन्होंने उसे बनारस में ठगा था तो परमवीर को यकीन हो जाता है कि उसके पिता और छोटा भाई बनारस में हैं। पिता-भाई की खोज में परमवीर बनारस जाता है। बनारस पहुंचते ही परमवीर की मुलाकात ठग भाई गजोधर और पिता धरम से हो जाती है, पर धरम उसे बेटा मानने से इंकार कर देते हैं। गजोधर परमवीर की ताकत का लाभ उठाने के लिए उसे अपनी गैंग में शामिल कर लेता है। पिता और भाई को पाने के लिए परमवीर उनके साथ ठगी के धंधे में उतर जाता है। बनारस पर किताब लिखने शहर में आई साहिबां से गजोधर को प्यार हो जाता है। साहिबां को हासिल करने के प्रयास में परमवीर का बिछड़ा परिवार एक हो जाता है।
यमला पगला दीवाना का आकर्षण धर्मेन्द्र, सन्नी देओल और बॉबी देओल हैं। तीनों का अभिनय सराहनीय है। कॉमिक, इमोशनल, एक्शन दृश्यों में धर्मेन्द्र और सनी देओल हंसाते और रूलाते हैं।  दो आइटम सांग, बॉबी-कुलराज पर फिल्माया रोमांटिक सांग और मिर्जा-साहिबा की प्रेम कहानी ने फिल्म को लंबा कर दिया है। कुलराज रंधावा सुंदर हैं, परंतु जब वे स्नातक को सनातक बोलती हैं तो दुख होता है। अनुपम खेर का अभिनय उल्लेखनीय है। सुचेता खन्ना पोली की भूमिका में ध्यान खींचती हैं। । पंजाब में पंहुचने के बाद फिल्म एक पल सोचने का मौका नहीं देती। सिर्फ हंसाती है। समीर कार्णिक की यह अब तक की सबसे अच्छी फिल्म है।